Friday, 4 November 2016

विद्यालयों का भविष्य- आर्थिक व्यवहार्यता संदेह में

विद्यालयों को अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपाय के रूप में इस्तेमाल किया गया है। उन्हें बच्चों को विकास करना व ऐसी नौकरियां लेना सिखाना चाहिये जिसमें शिक्षा की आवश्यकता हो। ये नौकरियां अच्छा वेतन देने वाली होती हैं और इस तरह वे देश की अर्थव्यवस्था बढ़ाती हैं। हालांकि सरकार स्वयं विद्यालयों की अर्थव्यवस्था के बारे में कभी नहीं सोचती है। उनके वित्तीय दृष्टिकोण से विद्यालयों के आने वाले 5 वर्षों के लिए मेरा पुर्वानुमान हैः

1. हर शिक्षक का वेतन बढ़ेगाः 7वां वेतन आयोग शिक्षकों के वेतन को 20 प्रतिशत से 35 प्रतिशत तक बढ़ा देता है। फिर लगभग 13 प्रतिशत से वार्षिक तौर पर वेतन बढ़ेगा जब तक अन्य वेतन आयोग नहीं बन जाता। इसका अर्थ है कि उसी शिक्षक को उतने ही समय में वही कार्य करने के लिए अधिक भुगतान किया जाएगा। शिक्षक की उत्पादकता या गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं है-केवल वेतन बढ़ेगा। शिक्षक के जीवनयापन की लागत में वृद्धि हुई है इसलिए वेतन की यह वृद्धि उचित हो सकती है परंतु हम यहां पर उस विषय की चर्चा नहीं कर रहे हैं।

2. कुल कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि होगीः पिछले कुछ वर्षों में सीबीएसई शिक्षण व गैर शिक्षण कर्मचारियों का रोज़गार अनिवार्य कर रहा है। उदाहरण के लिए, परामर्शदाता, विशेष शिक्षक, आत्मरक्षा शिक्षक की भर्ती व इस तरह के कई पदों की रचना सीबीएसई द्वारा की गई है। यह विद्यालय के संपूर्ण वेतन व्ययों को बढ़ा देता है।

3. 25 प्रतिशत सीटें आरटीई के बच्चों के लिए आरक्षित हैं। निर्धन बच्चों को अनिवार्य रूप से निःशुल्क शिक्षा दी जानी है। सरकार बच्चे के लिए केवल नाममात्र की लागत की प्रतिपूर्ति करेगी। यह बोझ स्वाभाविक रूप से विद्यालय पर पड़ेगा क्योंकि उनकी कुल शुल्क वसूली 25 प्रतिशत कम हो जाएगी। अभी बच्चों की संख्या 25 प्रतिशत क्षमता तक नहीं पहुंची है हालांकि यह स्पष्ट संकेत है कि आने वाले 5 वर्षों में ऐसा होगा।

4. शिक्षकों को निरंतर प्रशिक्षण की आवश्यकता हैः शिक्षकों को निरंतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है क्योंकि दुनियाभर में शिक्षा का क्षेत्र बड़ी तेज़ी से बड़ रहा है। जल्दी व बेहतर पढ़ाने के लिये नई तकनीकें हैं जिनका पता लगाने की व शिक्षकों को सिखाने की आवश्यकता है। इसमें बहुत से पैसों की आवश्यकता है। यह अनुमानित है कि विद्यालयों को शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए उनके वेतन के 10 प्रतिशत का बजट होने की आवश्यकता है।

5. अवसंरचना की गुणवत्ता में वृद्धि होना चाहियेः विद्यालय की इमारत व प्रौद्योगिकी को लगातार सुधारने की व बनाए रखने की आवश्यकता है। 5 वर्ष पहले विद्यालय में कोई सीसीटीवी केमरे नहीं हुआ करते थे -परंतु आज के विद्यालयों के लिए यह अनिवार्य है। यह केवल एक उदाहरण है कि विद्यालयों को किसमें निवेश करने की आवश्यकता है।

6. विद्यालयों से अभिभावकों की अपेक्षा बढ़ती ही रहती हैः अभिभावक विद्यालय से आशा रख रहे हैं कि वे सीबीएसई द्वारा अनिवार्य पाठ्यक्रम के अलावा भी कई वस्तुएं सिखाएं। विद्यालयों को शिष्टाचार, अंग्रेज़ी में बात करना व कई अन्य वस्तुएं सिखानी चाहिये। हर वस्तु में पैसे नहीं लगते पर बहुत सी वस्तुओं में लगते हैं।

7. शुल्क में वृद्धि को 10 प्रतिशत पर नियंत्रित किया जाता हैः उन्हीं अभिभावकों से विद्यालय द्वारा लिये जाने वाले शुल्क को 10 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है। तो जहां विद्यालय के खर्च वर्ष दर वर्ष 20 प्रतिशत से अधिक से बढ़ रहे हैं उनकी आय केवल 10 प्रतिशत से बढ़ेगी- इसका परिणाम क्या होगा?

जब तक सरकार स्वयं द्वारा वित्तपोषित विद्यालयों के प्रति उसका रवैया नहीं बदलती मुझे यकीन है कि अगले पांच वर्षों में निजी विद्यालय कष्ट भुगतने वाले हैं व निजी विद्यालयों की गुणवत्ता सरकारी विद्यालयों से भिन्न नहीं होगी। यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालीन प्रभाव डालेगा व भारत को 15 वर्ष पीछे धकेल देगा।

महाविद्यालयों में शुल्क समीति ने भारतीयों को विदेशी शिक्षा के क्षेत्र में 13 बिलियन खर्च करने के लिए प्रेरित किया है।

एसोचैम, सामाजिक विज्ञान के टाटा संस्थानों व आईआईएम-बी द्वारा किए गए कई अध्ययन इस निष्कर्श पर पहुंचे हैं कि विदेश में अध्ययन करने जाने वाले भारतीयों में जबरदस्त उछाल है। सांख्यिकी का यूनेस्को संस्थान और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा का संस्थान भी संख्या देते हैं जो साबित करते हैं कि 10 वर्ष की अवधि में विदेश में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में लगभग 250 प्रतिशत उछाल है। विदेशी मुद्रा का आधिकारिक बहिर्वाह 6 बिलियन डॉलर से 17 बिलियन डॉलर के मध्य कहीं होने का अनुमान लगाया गया है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि विदेश में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी वहीं बस जाते हैं व विदेशी राष्ट्र को कर देना प्रारंभ कर देते हैं। जहां वे भारत में रियायती प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करते हैं-जब सरकार को करों के माध्यम से सब्सिडी चुकाने की बारी उनकी होती है, वे उसे और कहीं चुकाते हैं। विदेशी शिक्षा ना केवल भारत का वर्तमान विदेशी मुद्रा भंडार को लूट लेती है बल्कि उसके भविष्य की आय को भी। लगातार बड़े पैमाने पर पलायन के अप्रत्यक्ष प्रभावों का व उस राशि का जो अभिभावक विदेश में पढ़ रहे उनके बच्चों से मिलने जाने के लिए खर्च करते हैं, हमें अंदाजा ही नहीं है।

विद्यार्थियों के विदेश जाने का मुख्य कारण भारत में गुणवत्ता शिक्षा की कमी है। आईआईटी में सीमित सीटें होती हैं व वे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होती हैं। अन्य महाविद्यालय भी हैं हालांकि उनमें भी सीटें सीमित होती हैं व पाठ्यक्रम एवं शिक्षा शास्त्र पुराने होते हैं। इस समस्या की जड़ मुक्त बाज़ार को शिक्षा के क्षेत्र में उसकी भूमिका अदा करने की अनुमति नहीं दी जाना है। महाविद्यालय शुल्क समिति के द्वारा विनयिमित किए जाते हैं। तो वे इतना शुल्क नहीं ले सकते जितना लोग भुगतान करने को तैयार हैं। शुल्क समिति केवल कीमत की वसूली की अनुमति देती है। तो महाविद्यालय उनके स्वयं के अधिशेष से नई क्षमता नहीं बना सकते। भारत में बढ़ते महाविद्यालय या तो दान द्वारा अथवा सरकार के वित्तपोषण द्वारा वित्तपोषित हैं। यह आय का एक गैर टिकाऊ स्त्रोत है। यह अभी या बाद में सूख जाता है व पूर्ण करने के लिए कई स्थितियों के साथ आता है।

हावर्ड विश्वविद्यालय 380 वर्ष पुराना है व इसमें 5.2 प्रतिशत की स्वीकृति दर है। 21000 विद्यार्थी 210 एकड़ की भूमि में अध्ययन करते हैं अर्थात 100 विद्यार्थी प्रति एकड़। आईआईएम-ए-जिसे हावर्ड विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित किया गया था, जो 55 वर्ष पुराना है व उसमें 1 प्रतिशत से कम की स्वीकृति दर है व 106 एकड़ में 494 विद्यार्थी पढ़ते हैं जिसका अर्थ है प्रति एकड़ 4। तो इस स्थिति में गलत क्या है? भारत कम संसाधनों के साथ एक घनी आबादी वाला देश है। हम भूमि की एक ही मात्रा में कम विद्यार्थियों को किस प्रकार पढ़ा सकते हैं जबकि हज़ारों लोग इन सीटों का इंतज़ार कर रहे हैं।

शुल्क समीति महाविद्यालयों का शुल्क निश्चित करती है, यह शुल्क का निर्धारण एक महाविद्यालय चलाने की कीमत के आधार पर करती है, जो लाभ यह विद्यार्थियों को देता है उसके आधार पर नहीं। ये कीमतें कभी कभी अधिक अनुमानित होती हैं व कभी कम। इसके अलावा, अच्छे महाविद्यालयों को बेहतर बनाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। चाहे वे कितने ही अच्छे बन जाए- वे एक ही शुल्क ले सकते हैं। इस समस्या का एक आसान समाधान महाविद्यालयों पर किसी भी तरह का शुल्क नियमन हटा लेना है। केवल प्रशासनिक विनियमन होना चाहिये व उनके पूर्व छात्रों के प्लेसमेंट पर पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिये। यह स्वतः ही महाविद्यालयों का स्तर सुधार देगा व उन्हें लगातार अपने पाठ्यक्रम संरचना को संशोधित करने में सक्षम करेगा ताकि उनके विद्यार्थियों को अच्छी नौकरियां प्राप्त हो सके। जब विद्यार्थियों को एक विशेष वेतन पर रखा जाएगा। यह भारत में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या को कम करेगा व महाविद्यालयों को उन मूल्य संवर्धन के आधार पर शुल्क लेने में सहायता करेगा जो वे उनके विद्यार्थियों की अर्जन क्षमता सुधारने के लिए करते है। 

बच्चे और टीवी

बच्चों के लिए छुट्टियों का अर्थ है टीवी देखने का समय-सरकार को कदम उठाने की आवश्यकता है। गुजरात में दिवाली की छुट्टियों का अर्थ है 15 से 20 दिन की छुट्टियां। अधिकांश व्यापार भी लगभग एक सप्ताह तक बंद रहते हैं और कई अभिभावक अपने बच्चों को छुट्टियों में घुमाने ले जाते हैं। जब तक विद्यालय बंद रहते हैं, उतने सभी दिनों तक अभिभावकों की छुट्टियां नहीं होतीं, इसलिए बच्चे घर पर स्वतंत्र होते हैं और उनके पास करने के लिए अधिक कुछ होता नहीं है। इसलिए लगभग 90 प्रतिशत बच्चे दिन में 3 घंटों से अधिक समय तक टी.वी देखते हैं। यह बहुत से अभिभावकों के लिए एक समस्या है। हालांकि सरकार इस समस्या को एक अवसर में बदल सकती है।

संयुक्त राज्य में सरकार ने 1990 में बच्चों की टीवी के लिए एक विनियमन लागू किया था। तो बच्चों के लिए किसी भी टीवी चैनल को इन नीयमों का पालन करना होगाः

  1. बच्चों के कार्यक्रम केवल सुबह 7 बजे से रात के 10 बजे तक प्रसारित होने चाहिये।
  2. प्रति सप्ताह तीन घंटे के कार्यक्रम प्रसारित किए जाने चाहिये जिसमें मनोरंजन के साथ या तो बच्चों के लिए शिक्षा अथवा जानकारी होनी चाहिये।
  3. ऐसे कार्यक्रमों पर ई/आई का चिन्ह लगा होना चाहिये।
  4. लंबाई में कम से कम तीस मिनट होना चाहिये एवं उसकी तारीख व समय को पहले से सूचित किया जाना चाहिये।
  5. चैनल प्रति घंटे केवल 10 से 12 मिनट के विज्ञापन दिखा सकता है।
  6. कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य वाणिज्यिक प्रयोजन नहीं है।
  7. कार्यक्रम के दौरान कोई भी वेबसाइट प्रदर्शित नहीं की जानी चाहिये।

इन नीयमों पर अधिक जानकारी इस पर उपलब्ध हैः

भारत को ऐसे नियमों की आवश्यकता है। हमारे टेलिविज़न कार्यक्रम बच्चों की सहायता नहीं कर रहे बल्कि उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। आज के बच्चे भीम को को उनके माता पिता की अवधारणा से बिल्कुल भिन्न चरित्र के रूप में जानते हैं। छोटा भीम की महाभारत के भीम के साथ केवल एक ही समानता है। लड्डू के प्रति उसका प्रेम। रोल नम्बर 21-कृष्ण की एक पूर्णतः गलत छाप देता है और बच्चे उसे बहुत पसंद करते हैं। यदि आप सेसम स्ट्रीट व डिज़्नी क्लब हाउस देखें तो आप पाएंगे कि वहां मनोरंजन के साथ ही बहुत सारी शैक्षिक सामग्री भी मौजूद होती है। यहां तक कि ऐसे टीवी कार्यक्रमों ने कुछ क्षणों तक दर्शक द्वारा प्रतिक्रिया देने का इंतज़ार करते हुए कार्यक्रम के पात्रों के मध्य बातचात को लागू किया है। डोरा दि एक्सप्लोरर एवं जेक दि नेवरलैंड पाइरेट्स काफी संवादात्मक कार्यक्रम हैं भले ही वे सूचना के आधार पर सीमित हैं।

सरकार को भारतीय टीवी सेगमेंट का विनियमन करना होगा अन्यथा बच्चों के मस्तिष्क का विकास प्रभावित होगा। बगैर किसी शारीरिक गतिविधि के घंटों तक टीवी देखने से बच्चों की सेहत के लिए समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी। इसके अलावा बेकार कार्टून मस्तिष्क की स्पष्ट रूप से सोचने की क्षमता को भी प्रभावित करते हैं। एक बच्चा जो प्रतिदिन 2 घंटे से अधिक टीवी देखता है, उसे 15 मिनट से अधिक देर टीवी ना देखने वाले बच्चे से कम रचनात्मक पाया गया है। मुझे आश्चर्य होता है कि डोरेमोन बच्चों को कौन से शिक्षाप्रद मूल्य प्रदान करता है? अंग्रेज़ी कार्टून देखने से बच्चों के अंग्रेज़ी बोलने के कौशल में सुधार हो सकता था परंतु वे भी अनुवादित हैं व हिन्दी में उपलब्ध हैं। इससे, थोड़ा बहुत लाभ जो वे दे सकते थे वह भी समाप्त हो जाता है!

यदि अभिभावकों के पास बच्चे को उत्पादक रूप से संलग्न करने के लिए कोई वैकल्पिक साधन नहीं है तो वे भी समान रूप से दोषी हैं। एकल परिवारों में पर्याप्त चचेरे व सगे भाई-बहन नहीं होते एवं कॉलोनी में दोस्त अधिक नहीं होते हैं जिनके साथ बच्चे खेल सकें। पज़ल, वर्ग पहेली, सुडोकु, शब्द खोज, बोर्ड खेल, कला व शिल्प, चित्रकारी व पुस्तकें पढ़ने को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिये।


Tuesday, 6 September 2016

यातायात सुरक्षा: क्या विद्यालय बदलाव ला सकते हैं?

हाल ही में विद्यालय से घर लौटने के दौरान दो लड़कों की मृत्यु हो गई व इससे देश की एक महत्त्वपूर्ण समस्या सामने आई -सड़क दुर्घटनाएँ व मृत्यु।

आँकडे़ बहुत गंभीर हंै- भारत में हर घंटे 15 व्यक्तिों की मृत्यु होती है व प्रतिदिन 20 बच्चों की। दुर्घटनाओं के कारण विकलांग होने की संख्या - प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख। पूरे विश्व में बुरे सड़क सुरक्षा आँकड़ों में चीन के बाद दूसरा स्थान भारत का ही स्थान है। हमारे पास विश्व के 1 प्रतिशत वाहन हैं परंतु 10 प्रतिशत दुर्घटना जनहानी!
तो विद्यालय, अभिभावक व राष्ट्र इन मृत्यु व विकलांगता को कम करने के लिए सामान्यतः क्या कर सकते हैं?

24.9 प्रतिशत मृत्यु दुपहिया वाहन पर होती है। दुपहिया वाहन पर मौत को रोकने का एक आसान उपाय है -हेलमेट। मैंने दुपहिया वाहन से होने वाली जितनी भी मौतों के बारे में सुना है उनमें से अधिकांश में पीड़ित ने हेलमेट नहीं पहना था। मुझे लगता है कि विद्यालय व अभिभावक हेलमेट अनिवार्यता आसानी से लागू कर सकते हैं।

10.8 प्रतिशत मृत्यु कार में होती हैं। कार में हानी को कम करने का आसान रास्ता सीट बेल्ट हैं। यू.के. का एक शोध बताता है कि कार के सीट बेल्ट, कार की पहली सीट की मृत्यु के 45 प्रतिशत को रोकते हैं। साथ ही, एयर बैग का सुरक्षा तंत्र तब ही सक्रिय होता है जब व्यक्ति ने सीट बेल्ट पहना हो। 1994 से भारत में पहली सीट में

सीट बेल्ट का होना अनिवार्य है और उसके बीस वर्षों बाद भी- 99 प्रतिशत लोग उन्हें नहीं पहन रहे हैं।
सीट बेल्ट व हेलमेट जैसे सुरक्षा उपकरण का उपयोग मृत्यु दर को सीधे कम करता है। हर सड़क दुर्घटना की सूचना देते समय समाचार पत्र के संवाददाताओं को यह उल्लेख करना चाहिए कि 50 प्रतिशत मृत्यु सुसाध्य क्षति से हुई है, परंतु समय पर ईलाज नहीं दिया गया। कुछ दूरस्थ स्थान होने की वजह से हो सकते है, तद्यपि यदि सभी नागरिकों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए कि एक सड़क दुर्घटना का सामना होने पर क्या किया जाना चाहिए, उस से कई लोगों की जान बच जाएगी। यदि वे रिपोर्टिंग (सूचना) कर रहे हैं, उन्हंे प्रक्रिया व बाधाएँ पता होनी चाहिए। मुझे यकीन है कि कोई भी व्यक्ति 108 पर फोन करेगा यदि उस पर दुर्घटना का आरोप ना लगाया जाए।

शराब पीकर वाहन चलाना भी सड़क दुर्घटना मृत्यु का एक अन्य प्रमुख कारण है। गुजरात में निषेध होने के कारण यहाँ शराब की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या बहुत कम है। उसका सबूत यह है कि भारत में सड़क दुर्घटना के शीर्ष 10 शहरों में गुजरात का एक भी शहर नहीं है। अहमदाबाद से छोटे शहर जैसे नासिक, जयपुर, कोच्चि, तिरूवनंतपुरम में सड़क दुर्घटना क्षति होने की संख्या अधिक है और इन सभी स्थानों में निषेध नहीं है। एक आसान समाधान, आपके रक्त में अल्केहोल का स्तर उच्च होने पर, ओला/उबेर जैसी टैक्सी सेवाओं का उपयोग करना है।

यातायात नियमों का पालन करना एक अन्य प्रमुख क्षेत्र है जिसमें भारत को सुधार करने की आवश्यकता है। गति सीमा के भीतर वाहन चलाना, सड़क संकेतों पर रूकना, व सही ओर गाड़ी चलाना, ये आसान से नियम हैं जिन से मृत्यु से बचाव किया जा सकता है।

बच्चों को उचित व्यक्तियों का अनुकरण करना चाहिए। अतिशीघ्र गाड़ी चलाने वाले व सड़क पर करतब करने वाले व्यक्ति वे हैं जिन्हें उनके परिवार की परवाह नहीं है। माता पिता के सड़क पर मरने के बाद बच्चे अकेले रह जाते हैं। उन्हें मानव जीवन का मूल्य समझाया जाना चाहिए व ऐसा करने पर वे बड़े होकर ज़िम्मेदार नागरिक बनेंगे।

क्यों ‘‘बोर्ड’’ की परीक्षाएं अधिक होनी चाहिए?

जब भी कोई ‘बोर्ड’ परीक्षा शब्द का उल्लेख करता है, वयस्कों को भयावह अनुस्मरण हो जाते हैं। यहाँ तक कि वे बच्चे जिन्होंने कभी बोर्ड परिक्षाओं का अनुभव नहीं किया, उन्होंने भी इसके विषय में इतनी कहानियाँ सुनी है कि वे भी भयभीत हो जाते हैं। तो वर्तमान में हमारे पास बोर्ड़ की दो परिक्षाएँ हैं। पहली 10वीं में व दूसरी 12वीं में है। सी.बी.एस.सी. ने उन्ही विद्यालय के शिक्षकों से उत्तरपुस्तिका का मूल्यांकन करवा कर 10वीं बोर्ड परीक्षा के महत्त्व को कम करने का प्रयास किया है। खैर हम जानने का प्रयास करते हैं कि बोर्ड परीक्षाएँ करतीं क्या हैं?

  • यह सभी बच्चों का मूल्यांकन समान स्तर पर करती है इसलिए समग्र राष्ट्र (या राज्य) के बच्चों का मूल्यांकन एक ही प्रश्नपत्र व एक ही अंकन स्वरूप के आधार पर किया जा सकता है व उनका परिणाम एक साथ ही घोषित किया जाता है। इससे महाविद्यालय को यह निर्णय लेने में सहायता मिलती है कि किसे प्रवेश दिया जाना है।
  • यह अभिभावकों को विद्यालय के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने में सहायता करती है कि क्या विद्यालय अच्छी तरह से पढ़ा रहा है। 

मुझे लगता है कि बोर्ड परीक्षाएँ विभिन्न कारणों से हर वर्ष ली जानी चाहिए (5वीं कक्षा के बाद)।

पहला यह कि इससे विद्यार्थी 12वीं कक्षा की कड़ी चुनौती का सामना करने के लिए प्रशिक्षित हो जाते हैं जिसके आधार पर उनके भविष्य का निर्णय होगा। इस प्रकार वे सभी तैयार रहेंगे।

दूसरा, उसी शिक्षक द्वारा पढ़ाया जाना व उसी के द्वारा मूल्यांकन किए जाने से हितों का टकराव पैदा होता है। ‘‘मोसल मा जमवानु अने मां पिरसनार’’। शिक्षिका उन्हीं प्रश्नों को दोहराते हुए पढ़ा सकती है जिन्हें वह परीक्षा में पूछने वाली है। ऐसे मामले हुए हैं जहाँ अंक प्रदान करने में शिक्षक उदार रहे हैं।

तीसरा, अभिभावक और अधिक प्रभावी ढंग से विद्यालय चुन सकते हैं, जब ऐसे परिणाम प्रकाशित होते हैं। तो वे मुल्यांकन कर सकते हैं कि कौन-सा विद्यालय वास्तव में अच्छी शिक्षा प्रदान करता है व उन्हें किस विद्यालय में उनके बच्चे को रखना चाहिए।

मेरा विचार है कि यदि सरकार एक समान प्रश्न पत्र का निर्णय ले व अन्य विद्यालय के  शिक्षकों से अज्ञात रूप से मुल्यांकन करवाएं, अभिभावक वास्तव में निष्पक्ष रूप से बच्चे व विद्यालय के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने में सक्षम होंगे। मैंने यह भी देखा है कि ऐसी परिक्षाएं पाठ्यक्रम के बेहतर गठन में सहायक हो सकती हैं। उन अवधारणाओं को पाठ्यपुस्तक में अच्छी तरह से शामिल करने की आवश्यकता है जिन्हंे अधिकांश विद्यालय के बच्चे समझ नहीं पाते हैं। निरंतर बुरे परिणामों वाले विद्यालयों का अधिक निरीक्षण किया जाना चाहिए व उनके स्तर को सुधारने के लिए समय पर सहायता दी जानी चाहिए।

हमें शिक्षक के वेतन व प्रोत्साहन (इंसेंटिव) को विद्यार्थियों के प्रदर्शन के साथ जोड़ना चाहिए ताकि अच्छे शिक्षकों को पुरस्कृत किया जाए व कमतर प्रदर्शन वाले शिक्षक प्रमाणित सफल शिक्षक से सीख सकें। अन्य महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन मापक जो तभी किया जा सकता है जब यह तंत्र उस योग्य हो ‘‘सुधार माप’’ तो यदि गणित का एक 8वीं कक्षा के शिक्षक को ऐसे विद्यार्थी प्राप्त होते हैं जिनका 7वीं कक्षा का मानक औसत परिणाम मान लीजिए 40 प्रतिशत था। यह मेहनती और बुद्धिमान शिक्षक उन परिणामों को मान लीजिए 60 प्रतिशत के औसत तक लेकर आया। शहर भर में 8वीं कक्षा के अन्य शिक्षक औसत परिणामों में केवल 5 प्रतिशत का ही सुधार ला पाने में सक्षम हुए, तब स्पष्ट तौर पर, परिणाम में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी उस विशेष शिक्षक की वजह से ही हुई है एवं अन्य शिक्षकों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करने के लिए उसे इंसेंटिव दिया जाना चाहिए।

प्रवेश खुला है -परंतु कहां आवेदन दिया जाए?

दीवाली समाप्त हो चुकी है और अधिकांश विद्यालयों ने प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। आप एकाएक ही समाचारपत्रों और होर्डिंगों में विभिन्न विद्यालयों के विषय में विज्ञापन देखेंगे जो यह घोषणा करते हैं कि अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए प्रवेश अब खुल चुके हंै। अधिकांश अभिभावक जो अपने बच्चे की शिक्षा प्ले ग्रुप या नर्सरी में आरंभ करवाना चाहते हैं, वे किसी न किसी विद्यालय पर विचार करने में व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे भी कुछ अभिभावक हैं जो उनके बच्चे के वर्तमान विद्यालय से असंतुष्ट हैं व दूसरे विद्यालय में स्थानांतरित होने में रूचि रखते हैं, और आवेदन करने के लिए यही सबसे उपयुक्त समय है।

पहले बच्चे के अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी दुविधाओं में से एक पूर्व विद्यालय व पूर्ण प्राथमिक विद्यालय का चयन करना है।

लगभग 7 वर्षों से छोटे पूर्व विद्यालय शहर के विभिन्न नुक्कड़ों व कोनांे में खुल चुके हैं। ऐसे विद्यालय सामान्यतः प्ले ग्रुप, नर्सरी व जूनियर के.जी. प्रदान करते हैं। कभी-कभी वे सीनियर के.जी. भी प्रदान करते हैं। वे पूर्व विद्यालयों की एक श्रंृखला से संबद्ध होते हैं या फिर एकल भी हो सकते हैं। वे स्थान की एक बड़ी सुविधा प्रदान करते हैं क्योंकि वे आमतौर पर अधिकांश आवासीय क्षेत्रों के 2-3 किलोमीटर के भीतर होते हैं। दुर्भाग्य से उनकी कुछ ख़ामियाँ भी हैं। पहली ख़ामी यह है कि ये शिक्षा का अनियंत्रित क्षेत्र है। इसमें कोई भी पाठ्यक्रम सरकार द्वारा निर्धारित नहीं है व बच्चों के प्रदर्शन के मूल्यांकन की कोई मानकीकृत पद्धति नहीं है। इसलिए विद्यालय ने बच्चों को वाकई पढ़ाया है या केवल उन्हें खेलने में व्यस्त रखा है, एक बड़ा प्रश्न है। यहाँ तक कि कुछ विद्यालय वर्ष में 180 दिवस कार्य भी नहीं करते और कई छुट्टियाँ दे देते हैं। कार्य दिवसों के लिए भी उनके संचालन के घंटांे की संख्या भिन्न होती है - कुछ के 3 घंटे होते हैं वहीं कुछ प्रतिदिन चार घंटे काम करते हैं। भारत में किसी भी अन्य शिक्षा विभाग को चाहे वह प्राथमिक, माध्यमिक, महाविद्यालय या व्यावसायिक पाठ्यक्रम हो, उसे पूर्व विद्यालय विभाग की तरह अनियंत्रित नहीं छोड़ दिया गया है।

दूसरी व सबसे बड़ी ख़ामी है कि बच्चे के पहली कक्षा में प्रवेश का क्या? अभिभावकों को जूनियर के.जी. के बाद एक प्राथमिक विद्यालय का चयन करना होता है। दुर्भाग्य से दुखद बात यह है कि अधिकंाश प्राथमिक विद्यालयों ने स्वयं का पूर्व विद्यालय प्रारंभ कर लिया है इसलिए उनके पास अन्य पूर्व विद्यालयों के बच्चों के लिए पहली कक्षा में रिक्त पद नहीं अथवा सीमित हंै। इस कारण से अधिकांश अभिभावकों को निचली श्रेणी के विद्यालय के लिए समझौता करना पड़ता है।

मैंने कुछ विद्यालयों से पूछा जिन्हांेने प्ले ग्रुप, नर्सरी व अन्य कक्षाओं के लिए प्रवेश खोला है। तो मैंने पूछा कि अभिभावक को प्ले ग्रुप या नर्सरी में आवेदन करने की क्या आवश्यकता है जबकि बड़ी कक्षाओं के लिए प्रवेश खुला है। मुझे ‘‘अस्वीकृति की संभावना’’ नामक एक दिलचस्प अवधारणा के विषय में पता चला। अहमदाबाद के शीर्ष 10 विद्यालयों में सबसे कम अस्वीकृति के स्तर प्ले ग्रुप/नर्सरी में है, एक सामान्य से कारण की वजह से कि उनके पास आवेदनों की तुलना में अधिक सीटे हैं। तो उदाहरण के लिए एक प्लेग्रुप में प्रवेश के लिए अस्वीकृति की संभावना 5 प्रतिशत होगी जबकि पहली कक्षा में प्रवेश के लिए अस्वीकृति की संभावना 95 प्रतिशत होगी।

मैं पाठकों को सुझाव दूँगा कि वे एक सुविज्ञ निर्णय लें व उनके बच्चों का प्रवेश प्राथमिक विद्यालयों में कम उम्र से ही करवा दें ताकि भविष्य में उनका प्रवेश सुरक्षित रहे।

क्या भविष्य में बच्चों की संख्या अधिक होगी?

विश्व की जनसंख्या 7.3 अरब है और जब से इसने 1 अरब के आंकडे को पार किया है, तबसे समीक्षक कहते आ रहे हंै कि विश्व और अधिक लोगों को नहीं रख सकता। अभी तक तो वे लोग गलत साबित हुए हैं। परंतु भविष्य में क्या होगा? वैश्विक जनसंख्या वृद्धि कब समाप्त होगी? मेरे दादाजी के 13 भाई बहन थे, मेरे पिताजी के 5 थे और मेरा एक था। मेरे पिताजी की समआयु के 99 प्रतिशत लोगों के 2 से अधिक भाई बहन होने पर भी उनके 2 से अधिक बच्चे नहीं है। तो एक पीढ़ी में क्या परिवर्तित हो गया और एक घरपरिवार में बच्चों की संख्या भारी रूप से क्यों गिर गई?

मैं प्रोफेसर हेंस रोसलिंग का एक बडा प्रश्ंासक हूँ, जिनके काफी सारे विड़ियो आॅनलाइन हैं जो इस पर प्रकाश डालते हैं कि किस प्रकार भविष्य में जनसंख्या बढ़ेगी। उनका कहना है कि एक माता के बच्चों की संख्या व उसके धर्म में अधिक संबंध नहीं है। प्रति महिला बच्चों की संख्या पर प्रभाव डालने वाले महत्त्वपूर्ण कारक हैं:

  • शिशु मृत्यु दर
  • माता की शिक्षा
  • आय में वृद्धि
  • विवाह की उम्र में वृद्धि
  • कामकाजी महिलाओं मंे वृद्धि


प्रो. रोसलिंग के अनुसार विश्व जनसंख्या 10 अरब तक पहुँच जाएगी व उस संख्या को पार नहीं करेगी। इस संख्या के पीछे उनके विभिन्न सांख्यिकीय प्रारूप हैं। तद्यपि रोचक तथ्य यह है कि हम ‘उच्चतम शिशु’ संख्या पर पहुँच चुके हैं। हम वर्तमान में बच्चों की संख्या से अधिक संख्या तक नहीं पहुँचने वाले हैं। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि होने के कारण यद्यपि हमारे पास हमेशा से 2 अरब बच्चे थे, विश्व की कुल जनसंख्या 3 अरब और बढ़ेगी व यह संख्या वहीं कायम रहेगी।  

तो विद्यालय के लिए क्या भविष्य है? यदि विश्व में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ने वाली तो हमंे  नए विद्यालयों की आवश्यकता क्यों है और क्या उनके पास बुनियादी ढ़ाँचे को बनाए रखने के लिए पर्याप्त बच्चे होंगे?

उत्तर है स्थानांतरण व अभिभावकों की आवश्यकताओं में परिवर्तन।

भारत का 70 प्रतिशत भाग गाँवों में रहता है। किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था में 25 प्रतिशत से अधिक लोग गँावों में निवास नहीं करेंगे। इसलिए यदि हम आशा करें कि आने वाले 10 वर्षों में हम 50 प्रतिशत शहरीकरण प्राप्त कर लेंगे, तो हम 24 करोड़ लोगों के शहर में आकर निवास करने के विषय में बात कर रहे हैं। यदि वे 100 मुख्य शहरों में आकर रहेंगे, तो इस प्रकार हर शहर में प्रतिवर्ष 2.4 लाख लोग जुडें़गे। वे अपने साथ बच्चों को लाएँगे जिन्हें शिक्षा की आवश्यकता होगी। इसलिए शहरों में विद्यालयों का निर्माण किया जाना आवश्यक है।

एक और बड़ी समस्या माता-पिता की आवश्यकताओं में परिवर्तन है। पहले गुजराती माध्यम विद्यालयों की माँग थी। अब अंगे्रज़ी माध्यम विद्यालयों की माँग है। महानगरों में लोग सी.बी.एस.ई. विद्यालयों को प्राथमिकता देते हैं ताकि नौकरी के लिए एक शहर से दूसरे शहर में स्थानांतरित होने में कठिनाई ना आए। धनी लोग अंतराष्ट्रीय विद्यालय को प्राथमिकता देते हैं जिनका एक अलग ही स्तर होता है। इसलिए विद्यालयों को बदलते समय के साथ स्वयं को बदलना होगा। पहले तैराकी व घुड़सवारी का विद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना दूर की कौड़ी लग रहा था। आज कुछ विद्यालय हैं जो अभी से ही वह प्रदान कर रहे हैं और भविष्य में छोटे विद्यालय बंद हो जाएँगे व ऐसे आधुनिक विद्यालय बढ़ेंगे।