Tuesday, 6 September 2016

वतानुकूलित (ए.सी.) विद्यालयः एक सुविधा या आवश्यकता?

कुछ दशक पहले यथोचित प्रकाश, पंखे व शौचालय की सुविधा के साथ एक विद्यालय अधिकतर भारतीयों के लिए एक सपने के पूरा होने के समान था। मुझे याद है कि अन्य विद्यालयों से मेरे विद्यालय में आने वाले विद्यार्थी ट्यूब लाईट/पंखों की संख्या की सराहना करते थे। वर्तमान में अभिभावकांे की अपेक्षाएँ बढ़ गईं हैं। ए.सी. एक अपेक्षा बन चुका है और भारत में कई विद्यालय उसे पूरा कर रहे हंै। बच्चे स्वयं भी पहले से कहीं अधिक ए.सी. के आदी हो गए हैं। माॅल, एयरपोर्ट और स्वयं के घर, सभी वातानुकूलित हैं। सुविधाओं का आदी होना एक सामान्य बात है और बच्चे ए.सी. की सुविधा के शीघ्र ही आदी हो जाते हैं। भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) की वजह से तापमान सहने की क्षमता से बाहर हो गया है। बच्चों को ऐसे तापमान में खेलने के लिए कहना भी कठिन है, पढ़ाई का तो प्रश्न ही नहीं। भारतीय रेल ने 2005 में ‘‘गरीब रथ’’ प्रारंभ की, निर्धनों को ध्यान में रखकर, जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है। यहाँ तक कि वह ट्रेन भी पूरी तरह वातानुकूलित थी। इसका अर्थ है कि अधिकारिक तौर पर ए.सी. अब कोई सुखसाधन नहीं वरन आवश्यकता है। याद रहे कि वह दस वर्ष पूर्व था।

आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक श्री.ली कुआन इयु (जिनका हाल ही में 23 मार्च 2015 को निधन हो गया), ने उनके एक साक्षात्कार में कहा था कि उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सभी सरकारी कार्यालयों को वातानुकूलित करना थी। उन्होने कहा था कि उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए ए.सी. एक वरदान है व इसने उत्पादकता में वृद्धि की है। उन्होने उनके पूरे जीवन में कार्यालय के लिए ए.सी. खरीदने से अधिक महत्वपूर्ण कोई भी कार्य नहीं किया है! तो क्या विद्यालय में ए.सी. सहायता करेगा? मैंने कुछ विद्यालय प्रशासकों व शिक्षकों से बात की है जिन्हांेने हाल ही में उनके विद्यालय में ए.सी. लगवाया है। विद्यार्थियों के ध्यान की अवधि में एक बड़ा सुधार हुआ है। बच्चे कम पानी पीते हैं क्योंकि उन्हें पसीना कम आता है और इसलिए वे प्रसाधन अंतराल भी कम लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा मंे अधिक समय व्यतीत होता है।

ए.सी. का एक बड़ा लाभ कक्षा के बाहर से आ रहे शोर को कम करना होगा। पंखों के हवा चीरने के शोर के कारण व्याख्यान देना भी कठिन हो जाता है। तो ए.सी. के होने पर शिक्षकों को कम चिल्लाना पडे़गा और इस प्रकार वे कम थकेंगे जिससे उनके कार्य की गुणवत्ता बढ़ेगी। ए.सी. की वजह से दरवाज़े बंद रहेंगे इसलिए मच्छरों का प्रवेश कम हो जाएगा। जैसा कि हम जानते हैं डैंगु के मामले बहुत अधिक हैं और ऐसे बचाव उपाय अपनाना आवश्यक है। भारत में वायु प्रदूषण का स्तर भी बढ़ गया है। चूंकि ए.सी. में एयर फिल्टर होता है जो हवा को साफ़ करता है, धूल के कण व प्रदूषक कम हो जाते हैं।

मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि भारत तेज़ी से विकसित हो रहा है व अभिभावकों की अपेक्षाएँ भी तेज़ी से बदल रही हंै। यहाँ तक कि जनता की माँग पर सरकार भी स्वयं को उन्नत कर रही है। मुझे यकीन है कि वह दिन दूर नहीं जब सभी प्रथम श्रेणी के विद्यालय वातानुकूलित होंगे। यह मध्यावधि में विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर, विद्यालय के बुनियादी ढांचे में किसी अन्य सुधार से अधिक सकारात्मक प्रभाव डालेगा।

बचपन का मोटापा: जीवनभर की एक समस्या?

मोटापा संयुक्त राज्य में सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या माना जाता है। यह जीवनशैली के रोगों का एक भाग है जो आय की वृद्धि व अस्वस्थ जीवनशैली के साथ आता है। प्राथमिक कारण जितनी कैलोरी ग्रहण की गई है उतनी उपयोग ना करना, जंक फूड खाना व व्यायाम न करना है।      

एक बार रूग्ण मोटापे से ग्रसित हो चुके व्यक्तियों में से कुछ ही वज़न कम कर पाते हैं व स्वस्थ रह पाते हंै। मोटापे से ग्रसित 100 व्यक्तियों में से 10 ही वज़न कम कर पाने मंे सक्षम होते हैं व उन 10 में से केवल एक ही 5 वर्ष तक मोटापे से दूर रह पाता है।

मोटापा, मृत्यु का धुम्रपान से भी अधिक बड़ा कारण बनने वाला है। तद्यपि, धूम्रपान की लत का त्याग करना सरल है, आप खाने की लत पर किस प्रकार निगरानी रखेंगे व नियंत्रित करेंगे? यह पाया गया था कि धुम्रपान, यदि 18 वर्ष की आयु से पूर्व प्रारंभ किया गया हो तो उससे मुक्ति प्राप्त करना लगभग असंभव है, इसलिए अवयस्कों को सिगरेट बेचना वर्जित है। क्या आप आइसक्रीम बेचने वालों को स्थूल बच्चों को आइसक्रीम बेचने से रोक सकते हैं? मस्तिष्क उसी प्रकार व्यवहार करता है चाहे वह चीनी की लत हो या कोकीन की।

धूम्रपान की ही तरह, यदि बच्चा स्थूल है, तो वह वयस्क होने पर भी स्थूल ही रहेगा। इसलिए शहरी परिवारों को मोटापे के विषय में जागरूकता प्राप्त करने की व यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि बच्चे कम उम्र में ही इस समस्या से ग्रसित ना हो जाए।

क्या भारत व चीन जैसे विकासशील देशों को चिंतित होना चाहिए? हाँ। चीन में एक संतान की नीति है। बढ़ रहे सकल घरेलू उत्पाद यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि माताएँ उनके बच्चों का अच्छे प्रकार से पालन पोषण कर रही हैं। इसी प्रक्रिया में वे स्थूल हो जाते हैं। 12 वर्ष से कम आयु के लगभग 10 प्रतिशत बच्चे स्थूल हैं। ऐसे बच्चों के लिए एक स्वस्थ वयस्क जीवन निर्वाह करना कठिन होगा।

हमें बच्चों के वज़न की देख-भाल करनी होगी। भारत एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जहाँ प्रति परिवार बच्चों की संख्या कम होती जा रही है व चीन के नज़दीक पहुँच रही है। परिवार की प्रयोज्य आय बढ़ती जा रही है व उसी के साथ उन्हंे उपलब्ध भोजन के विकल्प भी। मोटापे के प्रकोप के लिए सभी अग्रणी तत्व मौजूद हैं। ज़रा सी असावधानी के परिणामस्वरूप एक बड़े पैमाने पर बच्चे स्थूलकाय हो सकते हंै।

अब तक भारत की पाठ्यपुस्तकें कुपोषण व संतुलित आहार के साथ सरोकार रखती थी। किसी भी मापदंड से कुपोषित बच्चों की संख्या संभावित स्थूल बच्चों की संख्या से अधिक है। इसलिए सरकार एक ही प्रकार की पाठ्यपुस्तक संपूर्ण बोर्ड के लिए लागू नहीं कर सकती। निर्देशों का विशिष्टिकरण शिक्षक के स्तर पर किया जाना चाहिए जहाँ उन्हें विद्यार्थियों को कुपोषण व मोटापे के बीच की महीन रेखा के विषय में जागरूक करना होगा।

अभिभावक उनके बच्चों को घर में पकाया हुआ भोजन खिलाकर व उनके रोजमर्रा के जीवन में शारीरिक गतिविधियों को शामिल करके सहायता कर सकते हैं। मुझे यकीन है कि यदि अभिभावकों व बच्चों में पर्याप्त जागरूकता हो, तो हम बच्चों में मोटापे की समस्या को देश के बाहर कर सकते हैं ताकि हमारा भविष्य स्वस्थ हो।

धनी अथवा निर्धन: आपको चेरिटेबल (धर्माथ) ट्रस्ट द्वारा संचालित विद्यालयों में ही अध्ययन करना होगा।

चाहे आप मुकेश अंबानी जितने धनी व्यक्ति ही क्यों ना हों, जब तक कोई उदार व्यक्ति चेरिटेबल ट्रस्ट के अंतर्गत कोई विद्यालय नहीं खोल लेता तब तक सवाल ही नहीं उठता कि आप आपके बच्चे को शिक्षा दिलाएँगे। चाहे फीस (शुल्क) कितनी भी अधिक क्यों ना हो, या सुविधाएँ कितनी भी अच्छी क्यों ना हो, भारत मंे सभी विद्यालयों को कानूनी तौर पर ‘चेरिटेबल ट्रस्ट’ के द्वारा या सेक्शन 25 कंपनी (जिसका अर्थ है अलाभकारी) द्वारा चलाया जाना आवश्यक है। यह चेरिटेबल ट्रस्ट लाभ नहीं कमा सकते व उन्हें, जितना भी उनका अधिशेष हो, उसको संस्था के उद्देश्यों में पुनः निवेश करना होगा। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता की विद्यालय कितना शुल्क ले रहे हैं या कितनी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। विद्यालय शहर के एक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र में हो सकता है या किसी दूरस्थ गाँव में हो सकता है। इकाई चाहे जहाँ भी स्थापित हो उसे ‘अलाभकारी’ (लाभ के लिए नहीं) होना चाहिए। इसका एक छोटा-सा अपवाद है हरियाणा। केवल हरियाणा प्रदेश में ही ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ के विद्यालय लाभ के लिए हो सकते हैं व कंपनी/व्यक्ति/साझेदारी द्वारा संचालित किए जा सकते हैं। कुछ ऐसे उच्च श्रेणी के विद्यालय हैं जिनमें विश्व स्तर की सुविधाएं हैं, जो गुड़गांव में स्थित हंै।

ऐसी इकाइयों को आयकर में छूट दी गई है कि यह वर्ष में अर्जित अधिशेष उसी वर्ष (या अगले वर्ष) खर्च कर सकते हैं। उन्हें किसी प्रकार के आयकर का भुगतान नहीं करना होगा। आयकर अधिकारी प्रश्न उठा रहे हैं कि एक विद्यालय जो धनी व्यक्तियों की सेवा करता है, उसे आयकर से छूट क्यों मिलनी चाहिए। वातानुकूलित कक्षाओं के साथ, एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड का विद्यालय जो बाॅलीवुड़ के सितारों की सेवा करता है व 10 लाख रूपए प्रतिवर्ष का शुल्क लेता है। क्या उसे कर से छूट मिलनी चाहिए? हालांकि ऐसा कोई भी कदम गैरकानूनी होगा व कार्यान्वित होने मे बहुत लंबा समय लेगा।

क्या भारत में ऐसे कानून का होना उचित है?

दोनों। उचित क्योंकि शिक्षा, मापने के लिहाज से एक कठिन सेवा है व जब तक यह अच्छी तरह नियंत्रित नहीं की जाती, इसमें धोखाधड़ी होने की बहुत संभावना है। अभिभावक यह निर्णय लेने मे सक्षम नहीं हैं कि उनके बच्चे के लिए क्या उचित है और बहुत सारे विज्ञापन देखकर भ्रमित हो सकते हैं।

एक दलील यह है कि विद्यालय को ‘‘अलाभकारी’’ (लाभ के लिए नहीं) के रूप मे संचालित करना ठीक नहीं है क्योंकि इससे निवेश बहुत कम रहता है। कोई भी निवेशक ऐसे स्थान पर निवेश करना चाहेगा जहां उसे धनराशि व आय का प्रतिफल प्राप्त हो। यदि आप धन किसी ट्रस्ट में दान करते हैं तो कोई प्रतिफल नहीं मिलता। धनराशि हमेशा के लिए चली जाएगी। इसके परिणामस्वरूप लंबी अवधि में अच्छे विद्यालयों की कमी हो जाती है। मुझे नहीं पता कि इस समस्या का सही समाधान क्या है। परंतु एक बात हम सभी निश्चित रूप से जानते हैं कि एक अच्छे विद्यालय का निर्माण करने के लिए बहुत सारी धनराशि की आवश्यकता होती है व इस क्षेत्र में करोड़ों के निवेश को आकर्षित किए बगैर हम जनसमुदाय को उच्च श्रेणी की शिक्षा प्रदान नहीं कर सकते।

क्या विद्यालयों मंे पुस्तकों का स्थान टेबलेट् ले लेंगे?


टेबलेट पी.सी. एक उपकरण है जो लैपटाॅप मोबाईल फोन के मध्य में कहीं आता है। इसका वज़न लगभग 1 किलो होता है यह लोकप्रिय साॅफ्टवेयर चलाता है। आई-पैड विश्व के सबसे सफल टेबलेट पी.सी. मंे से एक है बाज़ार में आई-पैड के साथ प्रतिस्पर्धा करते कई कंपनियों के उत्पाद हैं, फिर भी बाजार शेयर का 75 प्रतिशत आई-पैड का है। तकनीक के कई प्रशंसकों ने सोचा कि 25,000 रू. प्रति मूल्य का आई-पैड विद्यालय की पाठ्यपुस्तकों, नोटबुक कार्यपुस्तकों का स्थान ले सकता है। यह बस्ते का वज़न कम करेगा कार्य तेज़ी होशियारी से करने में बच्चों की सहायता करेगा। यदि हम यह ध्यान में रखें कि आई-पैड को हर वर्ष बदला जाना होगा तो इसकी कीमत बहुत ही अधिक होगी। परंतु यदि यह तीन वर्ष से अधिक तक सुचारू रूप से बना रहे तो इसकी कीमत भारतीय मध्यमवर्ग के लिए भी वहन करने योग्य हो जाएगी।

इसी दृष्टिकोण के साथ एल...एस.डी. - लाॅस एंजेल्स युनीफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट ने 1.3 बिलीयन डाॅलर अर्थात 8600 करोड रूपए के मूल्य के आई-पैड़ खरीदे। इस प्रोग्राम को सबसे बढ़िया हार्डवेयर प्राप्त हुआ, सीधे आई-पैड निर्माताएप्पलद्वारा। अप्रेल 2010 मंे इसके लोकार्पण किए जाने के समय से ही इसे काफ़ी लोकप्रियता प्राप्त हो रही है। इसने वास्तव में टेबलेट पी.सी. व्यवसाय को जन्म दिया है। अब तक 2.6 करोड़ इकाईयों की बिक्री होने पर अब यह इतिहास में बहुत सफल उपकरण माना जाता है। उन्हांेने आई-पैड में पीयर्सन का सबसे अच्छा साॅफ्टवेयर डाला था। इससे शिक्षकों को प्रभावी रूप से पढ़ाने में विद्यार्थियों को आई-पैड पर गृहकार्य करने में सहायता मिलती। परंतु यह कार्यक्रम बुरी तरह असफल हो गया। अभी एफ.बी.आई. जाँच कर रही है कि क्या क्रय के निर्णय में कुछ अव्यवस्था थी। इस जांच का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या इस आवश्यकता को विक्रेता द्वारा संचालित किया गया था या कर्मचारियों को वास्तव में इस तकनीक की आवश्यकता थी?

तो क्या कभी भी टेबलेट पी.सी. विद्यालय की पाठ्यपुस्तकों का स्थान ले पाएँगे?

हम टेबलेट पी.सी. की आवश्यकता के विषय में बात करते हैं। विद्यालय के बस्ते भारी होते हैं टेबलेट उसे कम कर सकता है। मनुष्य उसके शरीर के 20 प्रतिशत के बराबर भार वहन कर सकता है। विद्यालय के बस्तों का वज़न कई बार शरीर के भार के 33 प्रतिशत जितना होता है और उसके दो मुख्य कारण हैं। सामान्य से कम वज़न वाले बच्चे बस्ते मंे अनावश्यक वस्तुएँ। अब यदि हम कुपोषित बच्चों की समस्या का समाधान नहीं करेंगे तो टेबलेट पी.सी. इसका समाधान नहीं बनने वाला। साथ ही यदि विद्यार्थी इसके बाद भी, विद्यालय में अनावश्यक वस्तुएँ लाते हैं तो इसका समाधान किया जाना आवश्यक है।

हर बच्चे के लिए टेबलेट पी.सी. होने से उसे पढ़ाई के लिए संपन्न साधन की सहायता प्राप्त होगी। वास्तविक तस्वीरें, एनीमेशन, आॅडियो, विडियो की सहायता से अवधारणाओं को शीघ्र समझने में सहायता मिलेगी। हालांकि अच्छी वस्तुओं के साथ बड़ी समस्या भी आती है, विकर्षण। दुर्भाग्य से टेबलेट पी.सी. में इतनी सारी सामग्री रखी हुई होने से, जिस तक बच्चा आसानी से पहुँच सकता है, उसकी एकाग्रता भंग होती है, जिससे पढ़ाई पर प्रभाव पड़ता है।

उपरोक्त को देखने पर टेबलेट्स का निकट भविष्य मंे कक्षा तक पहुँचना कठिन लगता है।